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ग़ज़ल
अहल-ए-बसीरत सोच से आरी काले धंदे गोरे लोग
हम ने बे-कारी के दिनों में जाने क्या क्या सोचा है
रफ़ीक राज़
शायरी के अनुवाद
गुल ने कुछ इस अदा से जलाया चराग़-ए-हुस्न
बे-चारी 'अंदलीब को परवाना कर दिया
अमीर ख़ुसरो
नज़्म
क़ैद-ए-तन्हाई
कोई नग़्मा, कोई ख़ुशबू, कोई काफ़िर सूरत
बे-ख़बर गुज़री, परेशानी-ए-उम्मीद लिए
