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नज़्म
अकेली बस्तियाँ
बे-कस चमेली फूले अकेली आहें भरे दिल-जली
भूरी पहाड़ी ख़ाकी फ़सीलें धानी कभी साँवली
महबूब ख़िज़ां
ग़ज़ल
किसी बे-कस के कासे में जो तू मक़्दूर हो जाए
गदा हो कर वो रश्क-ए-क़ैसर-ओ-मग़्फ़ूर हो जाए
इशरत हाफ़िज़ आबादी
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ग़ज़ल
खुला है ग़ुंचा-ए-दिल हर ग़रीब-ओ-बे-कस का
नसीम कू-ए-मदीना जहाँ जहाँ गुज़री
तहनियतुन्निसा बेगम तहनियत
नज़्म
हिन्दू मुस्लिम
कोई है मादर-ए-बे-कस का हक़ पहचानने वाला
बहुत हैं जानने वाले कोई है मानने वाला
सय्यद मेहदी हुसैन रिज़वी
नअत
वही की जिस ने हर इक 'आजिज़-ओ-बे-कस की ग़म-ख़्वारी
वही जो बे-नवाओं और यतीमों का सहारा है
महवी सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
आबरू शाह मुबारक
कुल्लियात
क्या क्या ख़्वाहिश बे-कस बेबस मुश्ताक़ उस से रखते हैं
लेकिन देख के रह जाते हैं चुपके से नाचार हैं सब
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
बहुत ही इबरत-अंगेज़ और हसरत-ख़ेज़ मंज़र है
लहद पर एक बे-कस के किसी का नौहागर होना
सफ़दर मिर्ज़ापुरी
कुल्लियात
जला क्यूँकर न होगा आशियान-ए-बुलबुल-ए-बे-कस
ब-रंग-ए-आतिश-ए-ख़स-पोश रंग-ए-गुल दहकता था
मीर तक़ी मीर
नज़्म
जज़्ब-ए-ग़ैरत
हर एक बे-कस-ओ-मज़लूम की हिमायत का
तुझे शुऊ'र दिया है ख़ुदा की रहमत ने

