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नज़्म
शिकवा
रहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों पर
बर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों पर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस बस्ती के इक कूचे में
इक शाम जो उस को बुलवाया कुछ समझाया बेचारे ने
उस रात ये क़िस्सा पाक किया कुछ खा ही लिया दुखयारे ने
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इरादा था कि मैं कुछ देर तूफ़ाँ का मज़ा लेता
मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी
राहत इंदौरी
ग़ज़ल
दुख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग
जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
कौन ग़ुलाम मोहम्मद 'क़ासिर' बेचारे से करता बात
ये चालाकों की बस्ती थी और हज़रत शर्मीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
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शेर
दुख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग
जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग
जावेद अख़्तर
नज़्म
मुस्लिम उम्मा का अमरीका से शिकवा
गिर गया तेज़ हवाओं से अगर तय्यारा
पकड़ा जाता है मुसलमान यहाँ बे-चारा
खालिद इरफ़ान
नज़्म
बदनाम हो रहा हूँ
बेचारे को ये कैसा आज़ार हो रहा है
देखे तो कोई जाने बीमार हो रहा है
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ऊट-पटाँग
रोज़ कई काने बेचारे मरते थे बीमारी में
कहते हैं राजा सोता था सोने की अलमारी में
गुलज़ार
ग़ज़ल
जिन की ज़िंदगी दामन तक है बेचारे फ़रज़ाने हैं
ख़ाक उड़ाते फिरते हैं जो दीवाने दीवाने हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
कॉफ़ी-हाउस
उन को अदब की सेह्हत का ग़म मुझ को उन की सेह्हत का
ये बेचारे दुख के मारे जीने से हैं क्यूँ बे-ज़ार
हबीब जालिब
ग़ज़ल
वोट न बेचें क्यूँ बेचारे बस कम्बल के बदले में
जो सर्दी में अपनी चमड़ी बिस्तर करें लिहाफ़ करें
सरदार पंछी
नज़्म
हुज़्न-ए-इंसान
आह इंसाँ कि है वहमों का परस्तार अभी
हुस्न बेचारे को धोका सा दिए जाता है
नून मीम राशिद
नज़्म
हाथों का तराना
ये चारागरान-ए-दर्द-ए-जहाँ, सदियों से मगर ख़ुद बेचारे
इन हाथों की ताज़ीम करो




