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ग़ज़ल
तिरे दो घूँट पी कर तिश्नगी भड़की तो ये जाना
वही अच्छे हैं जो बिल्कुल पियासा छोड़ देते हैं
मोहम्मद आज़म
ग़ज़ल
ख़ामोश न हो सोज़-ए-'सिराज' आज की शब पूछ
भड़की है मिरे दिल में तिरे ग़म की अगन बोल
सिराज औरंगाबादी
कुल्लियात
आग सी इक दिल में सुलगे है कभू भड़की तो 'मीर'
देगी मेरी हड्डियों का ढेर जूँ ईंधन जला







