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नज़्म
जाने क्यूँ ऐसा हूँ मैं
अक्सर ख़ुश आ जाती हैं
कोई अल्हड़ चेहरा देखूँ मन को वो भा जाता है
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
दीवाली
सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दिवाली का
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
बदनाम हो रहा हूँ
कहती हैं सब ये किस की तड़पा गई है सूरत
सलमा की शायद इस के मन भा गई है सूरत
अख़्तर शीरानी
नज़्म
सामान दीवाली का
सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दीवाली का
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दिल सी चेक-बुक है तिरे पास तुझे क्या धड़का
जी को भा जाए तो फिर चीज़ की क़ीमत पे न जा






