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फ़रीद परबती

1961 - 2011 | श्रीनगर, भारत

ग़ज़ल 9

शेर 5

किसी पे करना नहीं ए'तिबार मेरी तरह

लुटा के बैठोगे सब्र क़रार मेरी तरह

कभी मेरी तलब कच्चे घड़े पर पार उतरती है

कभी महफ़ूज़ कश्ती में सफ़र करने से डरता हूँ

तुम्हें भी भूलने की कोशिशें कीं

कि ख़ुद पर भी क़यामत कर गया वो

'फ़रीद' इक दिन सहारे ज़िंदगी के टूट जाएँगे

सबब ये है कि ख़ुद को बे-सहारा कर रहा हूँ मैं

बगूला बन के उड़ा ख़्वाहिशों के सहरा में

ठहर गया तो फ़क़त था ग़ुबार मेरी तरह

रुबाई 12

पुस्तकें 14

अाब-ए-नैसान

 

1991

Abr-e-Tar

 

1988

अक्स अक्स अाइना

मशाहीर-ए-अदब के ख़ुतूत बनाम-ए-फ़रीद पर्बती

2013

Daagh Ba-Haisiyat Masnavi Nigar

 

2010

Dagh Ba-Haisiyat-e-Masnavi Nigar

 

2010

फ़रीद नामा

 

2003

Guftugu Chand Se

 

2005

Hazar Imkan

 

2011

Hujoom-e-Aaina

 

2010

इंतिक़ाद-ओ-इस्लाह

 

2005

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