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रफ़ीक राज़

1954 | श्रीनगर, भारत

ग़ज़ल 31

शेर 2

तू मेरे सज्दों की लाज रख ले शुऊर-ए-सज्दा नहीं है मुझ को

ये सर तिरे आस्ताँ से पहले किसी के आगे झुका नहीं है

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रूह में जिस ने ये दहशत सी मचा रक्खी है

उस की तस्वीर गुमाँ भर तो बना सकते हैं

 

ई-पुस्तक 3

Anhar

 

2004

Mishraq

 

2009

Nakhl-e-Aab

 

2015

 

ऑडियो 6

इक धुआँ उठ रहा है आँगन से

इक फ़लक और ही सर पर तो बना सकते हैं

एक सहरा है मिरी आँख में हैरानी का

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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