ग़ज़ल 30

नज़्म 1

 

शेर 3

मैं ने तो यूँही राख में फेरी थीं उँगलियाँ

देखा जो ग़ौर से तिरी तस्वीर बन गई

वो कौन है जो मिरे साथ साथ चलता है

ये देखने को कई बार रुक गया हूँ मैं

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उस मुल्क में भी लोग क़यामत के हैं मुंकिर

जिस मुल्क के हर शहर में इक हश्र बपा है

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