सलीम बेताब

ग़ज़ल 30

नज़्म 1

 

अशआर 5

मैं ने तो यूँही राख में फेरी थीं उँगलियाँ

देखा जो ग़ौर से तिरी तस्वीर बन गई

सरमा की रात रेल का डिब्बा उदासियाँ

लम्बा सफ़र है और तिरा साथ भी नहीं

वो कौन है जो मिरे साथ साथ चलता है

ये देखने को कई बार रुक गया हूँ मैं

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'बेताब' लड़कियों की जसारत तो देखिए

ख़ुद को शुमार करती हैं सब अप्सराओं में

उस मुल्क में भी लोग क़यामत के हैं मुंकिर

जिस मुल्क के हर शहर में इक हश्र बपा है

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI