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ग़ज़ल
सारबाँ किस जुस्तुजू में है यहाँ मजनूँ कहाँ
अब बगूला भी न भटकेगा तिरे महमिल के पास
हरी चंद अख़्तर
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हिंदी ग़ज़ल
घने दरख़्त हैं इस राह से तू दिन में गुज़र
हुई जो रात तो भटकेगा जंगलों में कहाँ
हरजीत सिंह फ़ानी
ग़ज़ल
हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे
पागल कुछ तो सोच ये तू ने कैसी शक्ल बनाई है
जौन एलिया
ग़ज़ल
कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना
कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
गीत
हर इक बेजा तकल्लुफ़ से बग़ावत का इरादा है
मोहब्बत बे-रुख़ी से और भड़केगी वो क्या जाने