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ग़ज़ल
नील-गगन के रंग-भवन में है अपने पीतम का बास
हम धरती पर आशाओं की सेज सजाए बैठे हैं
तुफ़ैल होशियारपुरी
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गीत
राज-भवन के द्वार पे आ कर दुख से पुकार उट्ठे ये भिकारी
झिजक झिजक कर धीरे धीरे पाँव न अब तो बढ़ाओ पीतम
मीराजी
ग़ज़ल
ये मन-भावन सा अपना-पन जाने कहाँ से लाते हो
जब आते हो दिल का टुकड़ा एक चुरा ले जाते हो
जतीन्द्र वीर यख़मी ’जयवीर
ग़ज़ल
जोबन के भवन में लगी है आतिश-ए-गर्मी
छिड़के है तहूर आब ज़मिस्तान बुढ़ापा









