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ग़ज़ल
न कुछ चारा चला लाचार चारों हार कर बैठे
बिचारे बेद ने प्यारे बहुत तुम को बेचारा है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
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हास्य
चले जाते हैं खा कर रूखी-सूखी अपने दफ़्तर को
बिचारे मर्द सब रो-रो के अपने दिन बिताते हैं
राजा मेहदी अली ख़ाँ
ग़ज़ल
हर इक बेगम अगरचे मुनफ़रिद है अपनी सज-धज में
मगर जितने भी शौहर हैं बिचारे एक जैसे हैं
सरफ़राज़ शाहिद
नज़्म
झोंपड़ा
इस से है बादशह के नज़ारे का झोंपड़ा
इस में ही है फ़क़ीर बिचारे का झोंपड़ा
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
चाँद सितारों से क्या पूछूँ कब दिन मेरे फिरते हैं
वो तो बिचारे ख़ुद हैं भिकारी डेरे डेरे फिरते हैं
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
हुए हैं चाहने वाले तुम्हारे सैकड़ों पैदा
ये सच है जी कि किस गिनती में हैं याँ अब बिचारे हम
जुरअत क़लंदर बख़्श
नज़्म
जन्म-अष्टमी
मगर फ़साद है उस की सरिश्त में दाख़िल
बिचारे क्या करें पड़ ही चुकी ये आदत है

