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ग़ज़ल
ज़र्रे ज़र्रे में धड़कती है कोई शय जैसे
तिरी नज़रों ने फ़ज़ाओं में बिखेरा क्या है
नरेश कुमार शाद
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ग़ज़ल
विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है
वो रंग तू ने मिरी निगाहों पे जो बिखेरा पलट गया है