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ग़ज़ल
ज़र्रे ज़र्रे में धड़कती है कोई शय जैसे
तिरी नज़रों ने फ़ज़ाओं में बिखेरा क्या है
नरेश कुमार शाद
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नज़्म
हज़र करो मिरे तन से
इसे बिखेरा तो दश्त-ओ-दमन में बिखरेगी
बजाए-मुश्क-ए-सबा मेरी जान-ए-ज़ार की धूल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है
वो रंग तू ने मिरी निगाहों पे जो बिखेरा पलट गया है
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
लुढ़कता पत्थर
जिस ने आँखों में सितारे से कभी घोले थे
आज एहसास पे काजल सा बिखेरा उस ने