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ग़ज़ल
ये किस ने शाख़-ए-गुल ला कर क़रीब-ए-आशियाँ रख दी
कि मैं ने शौक़-ए-गुल-बोसी में काँटों पर ज़बाँ रख दी
सीमाब अकबराबादी
शेर
चमन के रंग-ओ-बू ने इस क़दर धोका दिया मुझ को
कि मैं ने शौक़-ए-गुल-बोसी में काँटों पर ज़बाँ रख दी
अख़्तर होशियारपुरी
ग़ज़ल
शौक़-ए-पा-बोसी-ए-जानाँ मुझे बाक़ी है हनूज़
घास जो उगती है तुर्बत पे हिना होती है
अकबर इलाहाबादी
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नज़्म
पनघट की रानी
सर पर इक पीतल की गागर ज़ोहरा को शरमाए
शौक़-ए-पा-बोसी में जिस से पानी छलका जाए
साग़र निज़ामी
ग़ज़ल
मयस्सर जिस से आ जाती थी साक़ी की क़दम-बोसी
मुक़द्दर में नहीं वो लग़्ज़िश-ए-मस्ताना बरसों से
अब्दुल मजीद सालिक
ग़ज़ल
मंज़िलें जिन की क़दम-बोसी पे नाज़ाँ थीं बहुत
वो जरी क़ाफ़िला-सालार कहाँ खो गए हैं
सुल्तान अख़्तर
नज़्म
गुजरात की रात
उन की पा-बोसी को जाए तो सबा कह देना
आज तक याद है वो आप के गुजरात की रात
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
क़दम-बोसी मयस्सर हो किसी सूरत से उस बुत की
'जमीला' बा'द-ए-मुर्दन ख़ाक-ए-कू-ए-यार हो जाना
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
हिमाला की बुलंदी भी क़दम-बोसी को गर उतरे
ज़मीं वाले ज़मीं के साथ ग़द्दारी नहीं करते

