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नज़्म
इम्तिहान
हाज़िरी अब कौन बोले कौन अब आएगा लेट
कॉलेज और स्कूल हैं सुनसान ख़ाली इन के गेट
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
रेग-ए-दीरोज़
हम मोहब्बत के ख़राबों के मकीं
रेग-ए-दीरोज़ में ख़्वाबों के शजर बोते रहे
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
लफ़्ज़ अगर बोते तो फिर फ़स्ल-ए-मआनी काटते
दोस्तो! अब शिकवा-ए-अहल-ए-हुनर करते हो क्यूँ
इक़बाल साजिद
नज़्म
इन किताबों में बंद उजाले हैं
इल्म से बहरा-वर जो होते हैं
नेकियाँ वो ज़मीं में बोते हैं
एजाज़ रहमानी
ग़ज़ल
ये ख़ुश्क क़लम बंजर काग़ज़ दिखलाएँ किसे समझाएँ क्या
हम फ़स्ल निराली काटते थे हम बीज अनोखे बोते थे

