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ग़ज़ल
यहाँ तस्बीह का हल्क़ा वहाँ ज़ुन्नार का फंदा
असीरी लाज़मी है मज़हब-ए-शैख़-ओ-बरहमन में
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
माथे पर टीका संदल का अब दिल के कारन रहता है
मंदिर में मस्जिद बनती है मस्जिद में बरहमन रहता है
क़य्यूम नज़र
ग़ज़ल
इश्क़-ए-बुत में कुफ़्र का मुझ को अदब करना पड़ा
जो बरहमन ने कहा आख़िर वो सब करना पड़ा
अकबर इलाहाबादी
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ग़ज़ल
शैख़ कहता है बरहमन को बरहमन उस को सख़्त
का'बा ओ बुत-ख़ाना में पत्थर है पत्थर का जवाब
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
क़दम क्यूँ-कर न लूँ बुत-ख़ाने में इक इक बरहमन के
कि आया हूँ यहाँ मैं शौक़ में इक बुत के दर्शन के
रंजूर अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
ख़ुदा ने किस शहर अंदर हमन को लाए डाला है
न दिलबर है न साक़ी है न शीशा है न प्याला है
पंडित चंद्र भान ब्रह्मण
ग़ज़ल
बरहमन बुत-कदे के शैख़ बैतुल्लाह के सदक़े
कहें हैं जिस को 'सौदा' वो दिल-ए-आगाह के सदक़े
मोहम्मद रफ़ी सौदा
ग़ज़ल
हमें दैर ओ हरम शैख़ ओ बरहमन से नहीं मतलब
हमारा दिल तो अपने दिल को बैतुल्लाह जाने है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
इक बरहमन ने कहा है मेरे हाल-ए-ज़ार पर
हो के मोमिन मर रहा है क्यूँ बुत-ए-पिंदार पर
