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नज़्म
समुंदर का बुलावा
ये सरगोशियाँ कह रही हैं अब आओ कि बरसों से तुम को बुलाते बुलाते मिरे
दिल पे गहरी थकन छा रही है
मीराजी
ग़ज़ल
जब अपने घर पे बुलाता हूँ मैं कभी उन को
उन्हें ज़रूर कोई ख़ास काम होता है
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
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ग़ज़ल
कूचा-ए-यार से महशर में बुलाता है ख़ुदा
कह दो 'मुज़्तर' कि न आएँगे यहीं अच्छे हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
समझ में कुछ नहीं आता समुंदर जब बुलाता है
किसी साहिल का कोई मशवरा अच्छा नहीं लगता



