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नज़्म
पोम्पिये
हुक्मराँ भी हैं, महल भी हैं, फ़सलें भी हैं
जेल-ख़ाने भी हैं और गैस के चेम्बर भी हैं
गुलज़ार
ग़ज़ल
ये सियह ख़ेमा है किस का इस में लैला कौन है
चम्बर-ए-अफ़्लाक के पर्दे में बैठा कौन है
आग़ा अकबराबादी
कहानी
मुस्तनसिर हुसैन तारड़
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ग़ज़ल
ख़त्म हुआ मेरा फ़साना अब ये आँसू पोंछ भी लो
जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
तुम्हें क्या
मोहब्बत की शफ़क़ बरसी तुम्हारे ख़ाल-ओ-ख़द पर
आइने चमके तुम्हारी दीद से
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
ज़र्द चेहरों पर भी चमके सुर्ख़ जज़्बों की धनक
साँवले हाथों को भी रंग-ए-हिना रौशन करे






