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ग़ज़ल
झिलमिलाती हुई बुझने लगी अब शम’-ए-हयात
ज़िंदगी भी है चराग़-ए-सर-ए-महफ़िल की तरह
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
ख़याल-ए-ख़ातिर
मैं चराग़-ए-सर-ए-मंज़िल हूँ मुझे जलने दे
मेरी ख़ातिर तू न कर ऐश-ए-बहाराँ से गुरेज़
सादिक़ नक़वी
ग़ज़ल
हर ज़र्रा चश्म-ए-शौक़-ए-सर-ए-रहगुज़र है आज
दिल महव-ए-इंतिज़ार है और किस क़दर है आज
हमीद नागपुरी
ग़ज़ल
आबला ख़ार-ए-सर-ए-मिज़्गाँ ने फोड़ा साँप का
सेली-ए-ज़ुल्फ़-रसा ने कल्ला तोड़ा साँप का
इमदाद अली बहर
शेर
खावेंगे टाँके ज़ख़्म-ए-सर-ओ-रू पर ऐ तबीब
पर ज़ख़्म-ए-दिल तो हम से सिलाया न जाएगा


