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ग़ज़ल
बुझा बुझा सा चराग़-ए-सर-ए-मज़ार हूँ में
ख़िज़ाँ ने जिस को सँवारा है वो बहार हूँ मैं
रौशन बनारसी
ग़ज़ल
आप देखें न चराग़-ए-सर-ए-महफ़िल की तरह
आप का दिल भी न हो जाए मिरे दिल की तरह

