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ग़ज़ल
दिल ग़म से बोझल हो तो देखो फिर छेड़ें उस की
छींटे मुँह पे मार के क्या बरसातें करता है
ज़ेब ग़ौरी
नज़्म
अकेले कमरे में
उदास पा के न छेड़ें सहेलियाँ मुझ को
बदल भी दो मिरी तन्हाइयों की तक़दीरें
कफ़ील आज़र अमरोहवी
नज़्म
गर्ल्स कॉलेज की लारी
वो आपस की छेड़ें वो झूटे फ़साने
कोई उन की बातों को कैसे न माने
जाँ निसार अख़्तर
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विषय
संसद
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chhe.De.n chalnaa
छेड़ें चलना چھیڑیں چَلْنا
जीवन में उतार चढ़ाव आना, दुख सुख से गुज़रना, आज़माइशों से दो चार होना
naabh-chhedan
नाभ-छेदन نابھ چھیدَن
cutting the umbilical cord
nak chhedan karnaa
नक छेदन करना نَک چھیدَن کَرنا
(आवाम की भाषा) नाक छेदना; (लाक्षणिक) थोड़ी थोड़ी बात पर आपत्ति या शिकायत करना
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ग़ज़ल
यूँ ही क्या कम है तिरी याद कि दिल को छेड़ें
ज़ुल्फ़-ए-पुर-ख़म लब-ए-रंगीं निगह-ए-नाज़ जुदा
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
कह दो दुनिया के हवादिस से न छेड़ें इस तरह
'जोश' हम तय्यार ही बैठे हैं मरने के लिए
जोश मलीहाबादी
नज़्म
परिंदों की म्यूज़िक कांफ्रेंस
तोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाए
उल्लू जब मिर्दंग बजाए कव्वा शोर मचाए
राजा मेहदी अली ख़ाँ
ग़ज़ल
अगर मुनकर नकीर आते हैं तुर्बत में तो आ जाएँ
न छेड़ें वो मुझे मह्व-ए-जमाल-ए-यार रहने दें
बेख़ुद देहलवी
ग़ज़ल
महशर इनायती
ग़ज़ल
तुझी से दाद-ए-वहशत लें तुझी को मेहरबाँ कर लें
जुनून-ए-शौक़ में जो चाहें हम ऐ आसमाँ कर लें



