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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
ये घड़ी महशर की है तू अर्सा-ए-महशर में है
पेश कर ग़ाफ़िल ‘अमल कोई अगर दफ़्तर में है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
दफ़्तर-ए-हुस्न पे मोहर-ए-यद-ए-क़ुदरत समझो
फूल का ख़ाक के तोदे से नुमायाँ होना
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
दफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयात
थी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर
जला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तू
हवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ को
अल्लामा इक़बाल
हास्य
और उस को सेठ के दफ़्तर के इक बाबू से उल्फ़त है
मैनेजर और बाबू के लिए वजह-ए-रक़ाबत है
ज़रीफ़ जबलपूरी
नज़्म
ज़ोहद और रिंदी
मज्मुआ-ए-अज़्दाद है 'इक़बाल' नहीं है
दिल दफ़्तर-ए-हिकमत है तबीअत ख़फ़क़ानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क्लर्क का नग़्मा-ए-मोहब्बत
और दाएँ पहलू में इक मंज़िल का है मकाँ वो ख़ाली है
और बाएँ जानिब इक अय्याश है जिस के हाँ इक दाश्ता है

