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नज़्म
परछाइयाँ
ये रात छनती हवाओं की सोंधी सोंधी महक
ये खेत करती हुई चाँदनी की नर्म दमक
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
वज़ीरे चुनीं
रह गया पास दल्लाक के मग़्ज़ उस का
वो बे-मग़्ज़ सर ले के दरबार-ए-सुल्ताँ में पहुँचा
नून मीम राशिद
शेर
यूँ है डलक बदन की उस पैरहन की तह में
सुर्ख़ी बदन की जैसे छलके बदन की तह में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
हफ़ीज़ ताईब
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नज़्म
रात की बात
चौंक कर उट्ठी तो देखा कि सितारे बन कर
औज-ए-अफ़्लाक पे है माँग की अफ़्शाँ की दमक
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
नहीं हो तुम मिरे और मेरा फ़र्दा भी नहीं मेरा
सो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरा
जौन एलिया
नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
किस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोर
यक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
सारी गली सुनसान पड़ी थी बाद-ए-फ़ना के पहरे में
हिज्र के दालान और आँगन में बस इक साया ज़िंदा था
जौन एलिया
नज़्म
दर्द आएगा दबे पाँव
शोला-ए-दर्द जो पहलू में लपक उट्ठेगा
दिल की दीवार पे हर नक़्श दमक उट्ठेगा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मैं मुज़्तरिब हूँ वस्ल में ख़ौफ़-ए-रक़ीब से
डाला है तुम को वहम ने किस पेच-ओ-ताब में
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
सब का तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके
सब के तो गरेबाँ सी डाले अपना ही गरेबाँ भूल गए

