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ग़ज़ल
ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो
कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़्तर
नज़्म
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया
मिरे सामने से हटा लो ये दुनिया
साहिर लुधियानवी
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ग़ज़ल
यूँ अर्ज़-ओ-तलब से कम ऐ दिल पत्थर दिल पानी होते हैं
तुम लाख रज़ा की ख़ू डालो कब ख़ू-ए-सितमगर जाती है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
उजले कपड़ों में रहो या कि नक़ाबें डालो
तुम को हर रंग में ये ख़ल्क़-ए-ख़ुदा जानती है


