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ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में
साहिर लुधियानवी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
है शायद दिल मिरा बे-ज़ख़्म और लब पर नहीं छाले
मिरे सीने में कब सोज़िंदा-तर दाग़ों के हैं थाले
जौन एलिया
नज़्म
सुर्ख़ गुलाब और बदर-ए-मुनीर
ऐ दिल पहले भी तन्हा थे, ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैं
और उन ज़ख़्मों और दाग़ों से अब अपनी बातें होती हैं
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
वाँ गया भी मैं तो उन की गालियों का क्या जवाब
याद थीं जितनी दुआएँ सर्फ़-ए-दरबाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
था दरबार-ए-कलाँ भी उस का नौबत-ख़ाना उस का था
थी मेरे दिल की जो रानी अमरोहे की रानी थी
जौन एलिया
नज़्म
दो इश्क़
गरजे हैं बहुत शैख़ सर-ए-गोशा-ए-मिम्बर
कड़के हैं बहुत अहल-ए-हकम बर-सर-ए-दरबार

