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ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
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ग़ज़ल
न सुन्ना तो हूर ओ क़ुसूर की ये हिकायतें मुझे वा'इज़ा
कोई बात कर दर-ए-यार की दर-ए-यार ही से तो काम है
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
तिरे दर से भी निबाहे, दर-ए-ग़ैर को भी चाहे
मिरे सर को ये इजाज़त कभी थी न है न होगी













