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नज़्म
अहद-ए-तिफ़्ली
पूछना रह रह के उस के कोह-ओ-सहरा की ख़बर
और वो हैरत दरोग़-ए-मस्लहत-आमेज़ पर
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
'सफ़ी' को शा'इरी से मिल गई हर-दिल-अज़ीज़ी भी
दरोग़-ए-मस्लहत-आमेज़ भी है क्या हुनर देखो
सफ़ी औरंगाबादी
ग़ज़ल
मेला राम वफ़ा
ग़ज़ल
दे के बू ज़ुल्फ़ की रख लो तह-महरम दिल को
ख़्वाब में फिर न डरोगे ये है डर का ता'वीज़
रियाज़ ख़ैराबादी
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ग़ज़ल
झटक कर फेंक दोगे चंद अन-चाहे ख़यालों को
मगर काँधों पे ये रक्खा हुआ सर कैसे फेंकोगे
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
झटक कर फेंक दोगे चंद अन-चाहे ख़यालों को
मगर काँधों पे ये रक्खा हुआ सर कैसे फेंकोगे
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
इक दरोग़-ए-मस्लहत-आमेज़ था तेरा सुलूक
ये हक़ीक़त थी मगर ये भी कहाँ समझा था मैं
द्वारका दास शोला
ग़ज़ल
किसी भी शख़्स को अब हर्फ़-ए-हक़ का पास नहीं
पनप रहा है यहाँ पर दरोग़-ए-हिकमत क्या
बख़्श लाइलपूरी
नज़्म
दीवार क़हक़हा
यहाँ पे भूतों का रक़्स देखोगे और फिर आप ही डरोगे
डरोगे आ काले का काले सायों का रक़्स
