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ग़ज़ल
लाल डोरे तिरी आँखों में जो देखे तो खुला
मय-ए-गुल-रंग से लबरेज़ हैं पैमाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
नज़्म
पत्थर
जिस में सदियों के तहय्युर के पड़े हों डोरे
क्या तुझे रूह के पत्थर की ज़रूरत होगी
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
जुगनू
फ़ज़ा-ए-शाम में डोरे से पड़ते जाते हैं
जिधर निगाह करें कुछ धुआँ सा उठता है
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
जब उड़ेगी उन की चश्म-ए-दाम-ए-परवरदा में ख़ाक
नर्म डोरे तेरी आँखों के रहेंगे ताबनाक
जोश मलीहाबादी
नज़्म
बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज
फ़ुज़ूँ-तर हुआ नश्शा-ए-कामरानी
तजस्सुस की आँखों में डोरे से आए
मुईन अहसन जज़्बी
ग़ज़ल
ख़ुदा के दामन-ए-रहमत से अपना दामन-ए-इस्याँ
वो क्या टाँकेगा जिस के आँख में डोरे नहीं रहते
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ख़त आप भेजेंगे मुझ को पतंग पर लिख कर
ये डोरे जाते हुए हैं उड़ाइए न मुझे

