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ग़ज़ल
पड़े दुम्बाल में मेरे सो उस नैनाँ के दुम्बाले
ख़ुदाया इश्क़ मुश्किल है भरम रख तूँ मआनी का
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
तुर्फ़ा हालत है कि उठ कर मैं जहाँ जाता हूँ
तेरे दीदार की ख़्वाहिश मिरे दुम्बाल है आज
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मोहब्बत में जो डूबा हो उसे साहिल से क्या लेना
किसे इस बहर में जा कर किनारा याद रहता है
अदीम हाशमी
ग़ज़ल
कहीं इस आलम-ए-बे-रंग-ओ-बू में भी तलब मेरी
वही अफ़्साना-ए-दुंबाला-ए-महमिल न बन जाए





