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ग़ज़ल
और कोई बात सर-ए-बज़्म-ए-सुख़न कब निकली
बस तिरी बात ही निकली है यहाँ जब निकली
मेहदी बाक़र ख़ान मेराज
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ग़ज़ल
बे-इख़्तियार हम जो सर-ए-बज़्म रो दिए
कितने सुनहरे ख़्वाब इन आँखों ने खो दिए
महेंद्र प्रताप चाँद
ग़ज़ल
उस की आँखों ने सर-ए-बज़्म ठहरने न दिया
सब्र मज़लूम को ज़ालिम की नज़र ने न दिया


