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ग़ज़ल
ख़ूब है ख़ूब उड़ा ऐ शब-ए-फ़ुर्क़त के मज़े
लुत्फ़ हर-हाल में देते हैं मोहब्बत के मज़े
मोहम्मद लुतफ़ुद्दीन ख़ान लुत्फ़
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ग़ज़ल
मैं चराग़-ए-शब-ए-हस्ती हूँ ज़िया क्या माँगूँ
ज़िंदा रहना है तो चलने के सिवा क्या माँगूँ




