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ग़ज़ल
ब-फ़ैज़-ए-इश्क़ हम ने जब ख़िरद का रास्ता बदला
मज़ाक़-ए-ज़िंदगी के साथ दिल का मुद्दआ' बदला
कलीम सरौंजी
ग़ज़ल
मसअला ये भी ब-फ़ैज़-ए-इश्क़ आसाँ हो गया
ज़ीस्त को अंदाज़ा-ए-ग़म-हा-ए-दौराँ हो गया
राम कृष्ण मुज़्तर
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शेर
सुनो हिन्दू मुसलमानो कि फ़ैज़-ए-इश्क़ से 'हातिम'
हुआ आज़ाद क़ैद-ए-मज़हब-ओ-मशरब से अब फ़ारिग़
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
ब-फ़ैज़-ए-इश्क़ हर जा सैंकड़ों दीवाने मिलते हैं
जहाँ भी शम्अ' रौशन हो वहीं परवाने मिलते हैं
खुर्शीद खावर अमरोहवी
नज़्म
ढाका से वापसी पर
थे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़त्म हुई बारिश-ए-संग
देखिए देते हैं किस किस को सदा मेरे बाद
'कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़'
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ये किस दयार-ए-अदम में...
जहाँ में बज़्म-गह-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का मेला
बिना-ए-लुत्फ़-ओ-मोहब्बत, रिवाज-ए-मेहर-ओ-वफ़ा