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नज़्म
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
वो तीर हो सागर की रुत छाई हो फागुन की
फूलों से महकती हो पुर्वाई घने बन की
अख़्तर शीरानी
नज़्म
दरवाज़ा खुला रखना
सीने से घटा उट्ठे आँखों से झड़ी बरसे
फागुन का नहीं बादल, जो चार-घड़ी बरसे
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
अबुल-अला-म'अर्री
कहते हैं कभी गोश्त न खाता था म'अर्री
फल-फूल पे करता था हमेशा गुज़र-औक़ात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
होली की बहारें
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दिल को इज़्हार-ए-सुख़न अंदाज़-ए-फ़तह-उल-बाब है
याँ सरीर-ए-ख़ामा ग़ैर-अज़-इस्तिकाक-ए-दर नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बस ये सुनना था कि पा-ए-गुल पे गिर कर मर मिटा
बन गया इक नक़्श-ए-इबरत उम्र भर मेरे लिए
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में सैर जो की हम ने जा-ए-गुल
छानी चमन की ख़ाक न था नक़्श-ए-पा-ए-गुल
मीर तक़ी मीर
नज़्म
हिलाल-ए-माह-ए-रमज़ान देख कर
जब ख़ुदा का डर नहीं तो फ़िक्र-ए-उक़्बा क्यूँ रहे
फ़ारिग़-उल-बाली में कोई भूका प्यासा क्यूँ रहे
मुख़तसर आज़मी
ग़ज़ल
पए-गुल-गश्त सुना है कि वो आज आते हैं
फूलों की भी ये ख़ुशी है कि खिले जाते हैं
लाला माधव राम जौहर
कहानी
He found his dear Diana lying dead on the way. A cup so fearful that lay by her side....


