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ग़ज़ल
मुबारक नाम तेरे 'आबरू' का क्यूँ न हो जग में
असर है यू तिरे दीदार की फ़र्ख़ुंदा-फ़ाली का
आबरू शाह मुबारक
नज़्म
सबा वीराँ
अब कहाँ से क़ासिद-ए-फ़र्ख़ंदा-पय आए?
कहाँ से, किस सुबू से कास-ए-पीरी में मय आए?
नून मीम राशिद
नज़्म
आज की रात न जा
आज की रात बहुत रातों के ब'अद आई है
कितनी फ़र्ख़न्दा है शब कितनी मुबारक है सहर
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
छब्बीस जनवरी
ये दौर-ए-नौ-मुबारक फ़र्ख़न्दा-अख़तरी का
जम्हूरियत का आग़ाज़ अंजाम क़ैसरी का
तिलोकचंद महरूम
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ग़ज़ल
जीत का पड़ता है जिस का दाँव वो कहता हूँ मैं
सू-ए-दस्त-ए-रास्त है मेरे कोई फ़र्ख़न्दा-पय
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दीवाली
जीत का पड़ता है जिस का दानों वो कहता है यूँ
सू-ए-दस्त-ए-रास्त है मेरे कोई फ़र्ख़न्दा-पय
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
उस की ख़्वाहिश थी सो 'फ़र्ख़न्दा' मैं क़ाइल हो गई
वो पयाम-ए-इश्क़ भेजेगा कभी सोचा न था
फ़र्ख़न्दा रज़वी
ग़ज़ल
उम्र-भर जिस के लिए आँखें रही हैं फ़र्श-ए-राह
वो अजल का क़ासिद-ए-फ़र्ख़न्दा-गाम आ ही गया
रशीद शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
कम ही होते हैं मुक़द्दर के सिकंदर चेहरे
कितने मुरझाए हैं इन चेहरों के अंदर चेहरे
फ़र्ख़न्दा रज़वी
ग़ज़ल
कम ही होते हैं मुक़द्दर के सिकंदर चेहरे
कितने मुरझाए हैं इन चेहरों के अंदर चेहरे



