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ग़ज़ल
दोस्तो फ़र्त-ए-जुनूँ राह बदलता है मिरी
किस ने चाहा था तुम्हें छोड़ के जाना सर-ए-राह
अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री
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ग़ज़ल
उस की आवारगी को दु'आएँ दो ऐ साहिबान-ए-जुनूँ
जिस के नक़्श-ए-क़दम ने बिछाए सर-ए-रहगुज़र आइने
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
हम वही अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-वफ़ा साहिब-दिल
हम कि हर दौर में औराक़-ए-ज़माना के अमीं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
चली ख़िरद की न कुछ आगही ने साथ दिया
रह-ए-जुनूँ में फ़क़त बे-ख़ुदी ने साथ दिया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ज़िंदा हो रस्म-ए-जुनूँ किस की नवा-रेज़ी से
अब रहा कौन यहाँ शो'ला-ब-जाँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
कोई मिलता ही नहीं वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-जुनूँ
अब तो बस्ती ही अलग अपनी बसा ली जाए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
ख़ुद अहल-ए-ख़िरद छोड़ गए राह-ए-वफ़ा को
हम अहल-ए-जुनूँ साहिब-ए-किरदार रहे हैं