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नज़्म
इज़हार
यूँ तो मुझ से हुईं सिर्फ़ आब-ओ-हवा की बातें
अपने टूटे हुए फ़िक़्रों को तो परखा होता
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
नशात-ए-उमीद
हो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमाम
पर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदाम
अल्ताफ़ हुसैन हाली
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नज़्म
तेरे सिवा
अब तलक भी मिरी फ़िक्रों के तराशीदा ख़ुतूत
जाने क्यूँ तेरे ख़द-ओ-ख़ाल में ढल जाते हैं
शाहिद अख़्तर
ग़ज़ल
कुछ सोचों के कुछ फ़िक्रों के कुछ थे एहसासात के नाम
जितने भी पत्थर आए सब आईना-ए-जज़बात के नाम
अमानुल्लाह ख़ालिद
ग़ज़ल
उन के फ़िक़्रों में न आएँगे ये सच्चे आशिक़
वाइ'ज़ आए हैं जो समझाने तो समझाने दो











