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नज़्म
आवारा
बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ
उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
न पूछो मुझ से लज़्ज़त ख़ानमाँ-बर्बाद रहने की
नशेमन सैकड़ों मैं ने बना कर फूँक डाले हैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
किसी ऐसे शरर से फूँक अपने ख़िर्मन-ए-दिल को
कि ख़ुर्शीद-ए-क़यामत भी हो तेरे ख़ोशा-चीनों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
पहले अपने पैकर-ए-ख़ाकी में जाँ पैदा करे
फूँक डाले ये ज़मीन-ओ-आसमान-ए-मुस्त'आर
अल्लामा इक़बाल
शेर
न पूछो मुझ से लज़्ज़त ख़ानमाँ-बर्बाद रहने की
नशेमन सैकड़ों मैं ने बना कर फूँक डाले हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
एक लड़का
कभी चाहा था इक ख़ाशाक-ए-आलम फूँक डालेगा
ये लड़का मुस्कुराता है ये आहिस्ता से कहता है
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
किस से मोहब्बत है
वो इक मिज़राब है और छेड़ सकती है रग-ए-जाँ को
वो चिंगारी है लेकिन फूँक सकती है गुलिस्ताँ को
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
रामायण का एक सीन
मैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज को
तुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज को

