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नज़्म
दम तोड़ती है शाम की नीली हवा
आज की शब चाँद को गरहन लगेगा
नींद को आँखें नहीं मिल पाएँगी
असग़र नदीम सय्यद
नज़्म
सूरज ग्रहन
इम्तिहाँ का वक़्त है सूरज गहन में आ गया
दोनों आलम की फ़ज़ाओं पर धुँदलका छा गया
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
चौदहवीं का चाँद
ग्रहन खा के ये अक्सर पयाम देता है
कि लम्हा भर को अगर रौशनाई खो जाए
मेह्र हुसैन नक़वी
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विषय
गरेबान
गरेबान शायरी
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ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
क़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती है
ख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है


