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ग़ज़ल
शौक़ बरहना-पा चलता था और रस्ते पथरीले थे
घिसते घिसते घिस गए आख़िर कंकर जो नोकीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हास्य
क़साई बकरे का गोश्त ले कर सभी हिमाला पे जा चढ़ेंगे
जो उन का पीछा करेगा घिस-पिस के एक मुश्त ग़ुबार होगा
अकबर लाहौरी
नज़्म
मुझे अभी बहुत दूर जाना है
नए मंज़र-नामे से तरतीब देने होंगे
चलते चलते मेरे जूते भी घिस गए हैं
ख़लील मामून
ग़ज़ल
इस क़दर मिस्ल-ए-क़लम मैं ने जबीं-साई की
बन गया घिस के दर-ए-यार का पत्थर काग़ज़
इमाम बख़्श नासिख़
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ई-पुस्तक
लोक-गीत
लोक-गीत
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gii
गी گی
गा का स्त्रीलिंग, उसे क्रिया के आगे लगा कर क्रिया भविष्य और एक वचन रूप के साथ बहुवचन स्त्रीलिंग बनाते हैं
Gii.n
ग़ीं غِیں
नशा करने वालों की वह घमंडी आवाज़ जो नशे की तरंग में निकलती है, बेहोशी की हालत में निकली हुई ग़ुनूदगी की आवाज़
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ग़ज़ल
लाख करें हम सज्दा ज़मीं पर लाख जबीं को घिस डालें
साफ़ न हो गर निय्यत 'गौहर' तो फिर सज्दा कुछ भी नहीं
तनवीर गौहर
ग़ज़ल
किस ने सिखलाई है तुझ को ये रविश रफ़्तार की
मिट गए क़ालीं के जो तेरे क़दम से घिस के फूल
शाह नसीर
शेर
शौक़ बरहना-पा चलता था और रस्ते पथरीले थे
घिसते घिसते घिस गए आख़िर कंकर जो नोकीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
मिट गए संग-ए-दर-ए-यार पे घिस घिस के जबीं
अपनी तक़दीर के लिक्खे को मिटाया न गया
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
हास्य
इसी से आशिक़ों की फ़ौज का अंदाज़ा कर लीजे
हुआ दो चार दिन में घिस-घिसा कर संग-ए-दर ग़ाएब
नाज़िर टोंकी
ग़ज़ल
इस तवक़्क़ो' पे कि देखूँ कभी आते जाते
घिस गए पाँव रह-ए-दोस्त में जाते जाते





