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ग़ज़ल
जहान भर की तमाम आँखें निचोड़ कर जितना नम बनेगा
ये कुल मिला कर भी हिज्र की रात मेरे गिर्ये से कम बनेगा
उमैर नजमी
ग़ज़ल
दिल में फिर गिर्ये ने इक शोर उठाया 'ग़ालिब'
आह जो क़तरा न निकला था सो तूफ़ाँ निकला
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
क्या रोका अपने गिर्ये को हम ने कि लग गई
फिर वो ही आँसुओं की झड़ी दो घड़ी के बाद
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ग़ज़ल
वाँ करम को उज़्र-ए-बारिश था इनाँ-गीर-ए-ख़िराम
गिर्ये से याँ पुम्बा-ए-बालिश कफ़-ए-सैलाब था
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
गिर्ये पे मेरे ज़िंदा-दिलो हँसते क्या हो आह
रोता हूँ अपने मैं दिल-ए-जन्नत-मक़ाम को
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
बुझेगा सोज़-ए-दिल ऐ गिर्या पल में आब तो दे
दिगर है आग में दुनिया यूँ ही अज़ाब तो दे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो
गिर्ये से शाम-ओ-सहर क्यूँ कि हमें काम न हो
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
गिर्ये से दाग़-ए-सीना ताज़ा हुए हैं सारे
ये किश्त-ए-ख़ुश्क तू ने ऐ चश्म फिर हरी की
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
अभी गर्द-ए-सफ़र के गिर्ये की है गूँज कानों में
अभी क्यूँ मुंतज़िर ख़ाली सराएँ शोर करती हैं
यासमीन हबीब
ग़ज़ल
बहाता हूँ कहीं अपने सिफ़ाल-ए-बे-मुरक्कब को
मैं गिर्ये के दिनों में चाक-ए-दुनिया पर नहीं होता
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
एक भी निकले न मेरी सी फ़ुग़ान-ए-दिल-ख़राश
गरचे ख़ूँ टपके गुलू-ए-मुर्ग़-ए-ख़ुश-आहंग से
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
कुल्लियात
गिर्ये पे रंग आया क़ैद-ए-क़फ़स से शायद
ख़ूँ हो गया जिगर में अब दाग़ गुल्सिताँ का


