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ग़ज़ल
जो भी मिला उसी का दिल हल्क़ा-ब-गोश-ए-यार था
उस ने तो सारे शहर को कर के ग़ुलाम रख दिया
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
मिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाई
मैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँ
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हर बच्चा आँखें खोलते ही करता है सवाल मोहब्बत का
दुनिया के किसी गोशे से उसे मिल जाए जवाब तो अच्छा हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ग़ज़ल
जो ज़माने को बुरा कहते हैं ख़ुद हैं वो बुरे
काश ये बात तिरे गोश-ए-गिराँ तक पहुँचे
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
हिण्डोला
चहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे में
फ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगे
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
अगस्त-1952
अब भी ख़िज़ाँ का राज है लेकिन कहीं कहीं
गोशे रह-ए-चमन में ग़ज़ल-ख़्वाँ हुए तो हैं



