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नज़्म
शिकवा
मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़
तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
देख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ माली
कौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वाली
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
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Guncha
ग़ुंचा غُنْچَہ
बंद कली, कोंपल, कलिका, कोरक, कली
guu.nge
गूँगे گُونگے
वह जो स्पष्ट बोल न पाता हो, जिसकी वाक्-शक्ति ऐसी विकृत हो कि कुछ भी बोल न सके, वो शख़्स जो ज़बान से ना बोल सके, दबाया हुआ, ज़बत किया हुआ, शांत, चुप-चाप
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ग़ज़ल
कब मेरा नशेमन अहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं
ग़ुंचे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं
क़मर जलालवी
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
है शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार में
सब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हर हाल में मिरा दिल-ए-बे-क़ैद है ख़ुर्रम
क्या छीनेगा ग़ुंचे से कोई ज़ौक़-ए-शकर-ख़ंद
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अब इन दिनों मेरी ग़ज़ल ख़ुशबू की इक तस्वीर है
हर लफ़्ज़ ग़ुंचे की तरह खिल कर तिरा चेहरा हुआ
बशीर बद्र
ग़ज़ल
मेरा क्या इक मौज-ए-हवा हूँ पर यूँ है ऐ ग़ुंचा-दहन
तू ने दिल का बाग़ जो छोड़ा ग़ुंचे बे-उस्ताद हुए
जौन एलिया
ग़ज़ल
ग़ुंचे मुरझाते हैं और शाख़ से गिर जाते हैं
हर कली फूल ही बन जाए ज़रूरी तो नहीं
