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ग़ज़ल
रुख़ से ज़ुल्फ़ों को हटाते आओ छत पे रात को
अस्ल चेहरा चाँद का सब को दिखाना है मुझे
अंकित मौर्या
नज़्म
सफ़ीर-ए-लैला-2
जहाँ पे अमरद-परस्त बैठे सफ़ा-ए-दिल की नमाज़ें पढ़ कर
ख़याल-ए-दुनिया से जाँ हटाते
अली अकबर नातिक़
ग़ज़ल
नीम-जाँ पहले से हूँ जल्वा-ए-जानाँ की क़सम
वो हटाते भी नहीं मुझ से निगाहें हद है

