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ग़ज़ल
अक़्ल ओ जुनूँ में सब की थीं राहें जुदा जुदा
हिर-फिर के लेकिन एक ही मंज़िल पे आ गए
जिगर मुरादाबादी
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ग़ज़ल
हज़ार इंकार या क़त-ए-तअल्लुक़ उस से कर नासेह
मगर हिर-फिर के होंटों पर उसी का नाम आएगा
शाद अज़ीमाबादी
नज़्म
नशात-ए-उमीद
तू ने ही राँझे की ये बंधवाई आस
हीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पास
अल्ताफ़ हुसैन हाली
हास्य
तअज्जुब है कि वो हर साल कैसे पास होती थी
जो ''इल्लम'' इल्म को मौलाना को ''मलवाना'' पढ़ती थी
सरफ़राज़ शाहिद
नज़्म
रोए भगत कबीर
जिस को देखो लीडर है और से मिलो वकील
किसी तरह भरता ही नहीं है पेट है उन का झील




