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ग़ज़ल
उमैर नजमी
नज़्म
नई तहज़ीब
ख़बर देती है तहरीक-ए-हवा तबदील-ए-मौसम की
खिलेंगे और ही गुल ज़मज़मे बुलबुल के कम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
मादाम
आप बे-वज्ह परेशान सी क्यूँ हैं मादाम
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
रात और रेल
डालती बे-हिस चटानों पर हक़ारत की नज़र
कोह पर हँसती फ़लक को आँख दिखलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
दरबार1911
पेश-रौ शाही थी फिर हिज़-हाईनेस फिर अहल-ए-जाह
बअ'द इस के शैख़ साहब उन के पीछे ख़ाकसार
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
हिस नहीं तड़प नहीं बाब-ए-अता भी क्यूँ खुले
हम हैं गिरफ़्ता-दिल अभी हम से सबा भी क्यूँ खुले
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
हमारी तहरीरें वारदातें बहुत ज़माने के बाद होंगी
रवाँ ये बे-हिस उदास नहरें हमारे जाने के बाद होंगी


