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तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
मुशाएरा
अब इस पे शाएर-ए-शीरीं-नवा को है ये गुमाँ
कि मेरे शोले से रौशन हुई है शम्अ-ए-बयाँ
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
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नज़्म
शाएरात और शाइ'र में कब्बडी
थे मजमूए जनाब के ग़मनाक अश्क-बार
पब्लिक ने जिन को हूट किया था हज़ार बार
शैख़ निज़ामी
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


