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ग़ज़ल
सजन आवें तो पर्दे से निकल कर भार बैठूँगी
बहाना कर के मोतियाँ का पिरोने हार बैठूँगी
हाश्मी बीजापुरी
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ग़ज़ल
बुत-ख़ाने नयन तेरे होर बुत नयन कियाँ पुतलियाँ
मुज नयन में पुजारी पूजा अधान हमारा
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
ख़ुदा माबूद है मुतलक़ बंदा मौजूद है मुतलक़
यू दोनों मुतलक़-ए-बर-हक़ समझ हर यक का मुश्किल है
क़ुर्बी वेलोरी
ग़ज़ल
क़ुली क़ुतुब शाह
ग़ज़ल
कम-निगाही होर तग़ाफ़ुल मत कर ऐ माह-ए-तमाम
मुक तिरा करता है ग़म्ज़ा काम 'आशिक़ का तमाम
क़ुर्बी वेलोरी
ग़ज़ल
मोती सूँ होर सुने से न जानों दिया है कुन
भर सब अपस के तन कूँ मुड़ी थी नज़र पड़ी
क़ाज़ी महमूद बेहरी
ग़ज़ल
ऐ सखीयन मैं ने देख्या संग कर के यार का
पन न देख्या बे-समझ होर संग-दिल तुझ सार का
क़ाज़ी महमूद बेहरी
ग़ज़ल
کوئی دل میں جیو تیو لے ہور کوئی تیرے نین کے نور ہوے
کوئی نور ہوے تجھ مکھ پر تے جا وارے چندر سور ہوے



