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ग़ज़ल
मैं पस-ए-तर्क-ए-मोहब्बत किसी मुश्किल में नहीं
दिल भी पहलू में नहीं दर्द भी अब दिल में नहीं
नूह नारवी
शेर
शमीम जयपुरी
ग़ज़ल
तर्क-ए-मोहब्बत अपनी ख़ता हो ऐसा भी हो सकता है
वो अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो ऐसा भी हो सकता है

