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ग़ज़ल
इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम
इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हिण्डोला
इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयात
उन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रें
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ख़ुद-कुशी
और मैं कर भी चुका हूँ अपना अज़्म-ए-आख़िरी!
जी में आई है लगा दूँ एक बेबाकाना जस्त
नून मीम राशिद
नज़्म
नशात-ए-उमीद
अज़्म को जब देती है तू मेल जस्त
गुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्त
अल्ताफ़ हुसैन हाली
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रेख़्ता शब्दकोश
jast
जस्त جَسْت
उछल, कूद, फाँद, छलांग, उछाल, कुदान, उत्फाल
zaat
ज़ात ذات
(हिंदू) हिंदुओं में मनुष्य समाज का वह विभाग जो पहले पहल कर्मानुसार किया गया था, पर पीछे से स्वभावत: जन्मानुसार हो गया, हिंदुओं के चार सामाजिक जातियों में से एक ब्रह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र में से कोई एक समूह या संप्रदाय
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ग़ज़ल
वक़्त की इंतिहा तलक वक़्त की जस्त 'अमीर-इमाम'
हस्त की बूद 'अमीर-इमाम' बूद की हस्त 'अमीर-इमाम'
अमीर इमाम
नज़्म
उलझनें
निराली जस्त करना है नए रस्ते पे चलना है
नए शोलों में तपना है नए साँचे में ढलना है
कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल
तू पयम्बर सही ये मो'जिज़ा काफ़ी तो नहीं
शाइ'री ज़ीस्त के ज़ख़्मों की तलाफ़ी तो नहीं



