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ग़ज़ल
ये दुनिया-भर के झगड़े घर के क़िस्से काम की बातें
बला हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ
जावेद अख़्तर
शेर
शैख़ अपनी रग को क्या करें रेशे को क्या करें
मज़हब के झगड़े छोड़ें तो पेशे को क्या करें
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
आरज़ू लखनवी
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नज़्म
जाने क्यूँ ऐसा हूँ मैं
मिलने से घबराता हूँ मैं झूट नहीं कह पाता हूँ
उस के शिकवे उस की शिकायत झगड़े से डर जाता हूँ
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
दार-उल-मकाफ़ात
याँ हर-दम झगड़े उठते हैं हर-आन अदालत बस्ती है
गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है
नज़ीर अकबराबादी
हास्य
जो उस के नाम पर करते थे झगड़े और हंगामे
वो उस तूफ़ान में रहती थी तूफ़ानाना पढ़ती थी
सरफ़राज़ शाहिद
ग़ज़ल
पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है
नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में
