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नज़्म
मक़ाम-ए-आख़िर-ए-शब
उठा के सुब्ह-ए-तमन्ना के ज़रफ़िशाँ-परचम
मक़ाम-ए-आख़िर-ए-शब से गुज़र रहे हैं आज
रियाज़ अनवर
नज़्म
सफ़र-ए-आख़िर-ए-शब
कि ऐ फ़िराक़ की रातें गुज़ारने वालो
ख़ुमार-ए-आख़िर-ए-शब का मिज़ाज कैसा था
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़ज़ल
दस्तरस आसाँ नहीं कुछ ख़िर्मन-ए-मअ'नी तलक
जो भी आएगा वो लफ़्ज़ों के गुहर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मिरा माज़ी नज़र आया मुझे हाल-ए-हसीं हो कर
जो उन के साथ देखे थे वो मंज़र याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
जब हो दम-ए-आख़िर तो बचा लेने की ताक़त
फिर ख़ाक-ए-शिफ़ा में न कहीं आब-ए-बक़ा में


